सुस्त और आलसी होने के कारण

एक बार मै सुरत में अपने काम से छुटकर लंच करने निकला रोड पे धीरे-धीरे जा रहा था कि पीछे से एक आदमी जल्दी- जल्दी आया और मुझ से बोला इस भागती दौड़ती जिन्दगी मे इतना धीमा आलसी की तरह चल रहे क्यो चल रहे हो।

मुझे उसकी बात अच्छी तो नही लगी फिर भी मैने उसको प्यार से बताया कि सामने की बिल्डिंग मे काम कर रहा था लंच टाइम है उस दुकान मे जा रहा कुछ खा पीकर आऊगा और थोड़ा काम से थक गया हू मेरे पास आधा घण्टा समय भी है लंच का इस लिए आराम से जा रहा हूँ।

आदमी मेरी बातो से हँसा बोला बेटा वजह कोई भी हो मन्जिल पर जाते हुए धीमा चलना आलसी होने की पहली निशानी है इतना कह कर वह अपनी स्पीड में चला गया फिर अगले 2साल में दो, तीन आदमी और ऐसे मिले जिन्होने मुझे आलसी ,सुस्त कहा।

अब ये बात मेरे दिमाग मे घर कर चुकी है मैने अपने अन्दर बदलाव की बहुत कोशिश करता हूँ लेकिन अभी तक नही कर पाया वजह क्या है हर किसी की सोच अलग हो सकती है मेरी सोच से वजह 2ही हो सकती है।

पहली – या तो ये आलस, सुस्ती  मुझे विरासत में मिली है क्योकि मेरे पिता बहुत ही सुस्त है शायद मेरे से दस गुना ज्यादा।

दूसरी वजह सामने लक्ष्य क्या है जैसे किसी को देर हो रही हो तो फास्ट चलता है

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